यह यात्रा केवल वर्षों की गणना नहीं, बल्कि त्याग, संघर्ष और समर्पण की वह गाथा है जिसने वैष्णव समाज को एक संगठित शक्ति में परिवर्तित किया।
सन् 1977 के आसपास, जब मुंबई में आज जैसी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं, तब रोजगार की तलाश में आए समाज बंधुओं के लिए न आवास था, न मार्गदर्शन।
पंचमुखी हनुमान मंदिर, भूलेश्वर तथा कुछ समाजसेवियों के निजी निवास समाज के लिए आश्रय स्थल बने। यही निस्वार्थ सेवा भावना आगे चलकर एक सशक्त संगठन की नींव बनी।
इसी सेवा भावना से “पाली जिला वैष्णव समाज सेवा संघ” का गठन हुआ — समाज को संगठित करने का पहला ठोस प्रयास।
स्व. एन.एन. वैष्णवजी, स्व. चंपालालजी, स्व. सांकलदासजी भाटुन्द जैसे वरिष्ठ मार्गदर्शकों के नेतृत्व में समाज ने एक नई दिशा प्राप्त की।
आगे चलकर “मुंबई वैष्णव (च.स.) समाज सेवा संघ” की स्थापना हुई, जिसने पूरे समाज को एक सूत्र में बाँध दिया।
सन् 1980 में प्रकाशित पहली परिचय स्मारिका में 184 परिवारों का विवरण था — यह समाज की पहचान और सामूहिक शक्ति का प्रमाण बनी।
वर्षों बाद दूसरी स्मारिका का स्वप्न स्व. गोविन्दजी एम. वैष्णव ने देखा। उनके देवलोक गमन के पश्चात भी भानुशंकरजी वैष्णव एवं देवकिशनजी वैष्णव द्वारा यह कार्य पूर्ण कर समाज को समर्पित किया गया।
समाज की बढ़ती गतिविधियों ने एक स्थायी केंद्र की आवश्यकता को जन्म दिया। भायंदर स्थित वेंकटेश पार्क में श्री रामचन्द्रजी जेठुदासजी वैष्णव द्वारा बिना किसी नाम की आकांक्षा के निजी भूखंड समाज को समर्पित किया गया।
स्व. एन.एन. वैष्णवजी, स्व. गोविन्दजी एम. वैष्णव, श्री जयंतिभाई बी. वैष्णव सहित अनेक भामाशाहों के सहयोग से यह भवन साकार हुआ।
समाज की गतिविधियाँ मुंबई तक सीमित नहीं रहीं। राष्ट्रीय सम्मेलन, तीर्थ यात्राएँ, सामूहिक विवाह और शैक्षणिक प्रोत्साहन ने समाज को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
श्री जयंतिभाई बी. वैष्णव के नेतृत्व में समाज को नई ऊर्जा और सशक्त दिशा प्राप्त हुई।
आज वैष्णव समाज केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक जागरूक और उत्तरदायी सामाजिक शक्ति है।
यह यात्रा निरंतर आगे बढ़ रही है — नव पीढ़ी को संस्कार सौंपते हुए, भविष्य को दिशा देते हुए।